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Saturday, September 27, 2014

रेत

रेत उडकर जब भी बदन से आके लिपटती है ..तो अनेको नाम भी उड़कर बदन पर गिर चिपक जाते है और थोड़ी देर में झड जाते है



ये धुली सी रेत कह रही है....कबका धुल गया है वो एक तेरा नाम , जो इस साहिल पे लिखा था कभी ...@ 

सखी सिंह 

ye dhuli si ret kah rahi ..kab ka dhul gya hai wo ek tera naam jo is sahil pe likha tha kabhi . 

Sakhi Singh

फोटो -मृणाल शेखर

Friday, April 11, 2014

मन के भाव

हम बात करते है ..निश्छलता की....उम्मीद ये करते है की ..सबका प्यार हमारे लिए निश्छल हो ...पर क्या खुद  किसी से निश्छल प्रेम करके देखा?
हम्बात करते है कुटिलता की ..दुहाई देते है अक्सर हम लोगो के मन में बसी कुटिलता की ..और कहते है की देखो कितना मक्कार है ...पर क्या हम अपने मन की कुटिलता को दूर कर सबके लिए अपना मन  निर्मल रखते है ?
और पता है हमारे अन्दर की सबसे बड़ी  कमी क्या है? ....हम जैसा खुद नहीं करते है बिलकुल वैसा खुद के लिए करने की दुसरो से उम्मीद लगाये बैठे रहते है ...क्या है ये?...१.२५ ऍम ..१२/४/१४

Saturday, August 10, 2013

sukoon..सुकून

अगर शब्द है तुम्हारे पास तो सुकून है
मेरा सुकून खो जाता है जब शब्द नहीं होते

agar sahbd hai tumhare pass to sukun hai
mera sukoon kho jata hai jab shabd nahi hote....12.50 am...11/8/13

रंग के मौसम

तुम्हारे जैसे रंग के मौसम मुझे बहुत पसंद  है ..उसने जब मुझसे कहा में बहुत जोर से हस दी . 
मेरे जैसे रंग के मौसम ? क्या मतलब है तुम्हारा मैंने हस्ते हुए ही पूछा .
तब जैसे उसके चेहरे पर मौसम का रंग आकार टिक गया और एक हल्का सा खुमार आँखों में भरते हुए  उसने कहा था मुझसे कि जैसे ये मौसम है न सावन में कभी गिला सा है, कभी पतझड़ सा बेनूर और कभी बसंत  सा पुरनूर ..वैसे ही तो तुम भी हों एक पल में सावन की तरह आँखों से बारिश करती हुई , कभी उदास चेहरे पर पतझड़ का आलम लाती हुई और कभी हसती आंखे..गुलाबी गाल और इन्द्र धनुषी रंग बिखराती हुई तुम..क्या इन रंग बदलते मौसमों से कमतर हों ..और मैं अवाक सी इन बातो को सुन उनमे घुली जा रही थी ..कि शायद कोई और मौसम मेरे भीतर बस जाए.
फिर मुझे अहसास हुआ ये मौसम और जीवन दोनो तो एक ही जैसे है जो मुझे एक दूसरे से जोड़े रखते है . 12. 4 am...11/8/13

Tuesday, August 6, 2013

शब्द

अक्सर जब मन उलझनों में जकड़ने लगता है ...तब शब्द संबल बन 

जाते है और आकर कहते है ..सब कुछ कर सकते है जब हम साथ हों 

..शब्दों का कमाल देखो फिर से सारी उलझाने जैसे दूर भागने लगती है 

..और नयी स्फूर्ति के साथ कदम आगे बढ़ने लगते है ..शुक्रिया इन 

शब्दों का जो एक पल में सारी मुश्किलों से दूर मुझे ले जाते है .

Friday, May 31, 2013

शायद

तुमने कह तो दिया बड़ी ख़ामोशी से कि मुझे अपनी जिंदगी में शामिल कर लो.
इसका अर्थ पता है क्या है ..अपनी जिंदगी में तुम्हारे हवाले कर दूँ. पर  क्या अपनी जिंदगी की  डोर तुम्हारे हाथो में देकर में सुकून के दो पल बिता सकूंगी  ?
ऐसे कैसे मैं आसानी से स्वीकार कर लूं तुहारा निर्णय ? पर फिर तुम्हारा अडिग होकर अपने  निर्णय से बार बार मुझे अवगत करना और कहना क्यों डरती हों तुम ? मैं हू न हर हाल  में तुम्हारे साथ . तुमको कभी कोई कष्ट  न हों इस बात  का ध्यान में सदैव रखूँगा .
नहीं मुझे डर लगता है ...ये प्यार व्यार कि बाते अपनी समझ से परे है ..बिना बात के अपने दिल को कष्ट दूँ मैं इतना बड़ा काम मैं नहीं कर पाऊँगी .फिर वोही मनुहार कि बात और धीरे धीरे तुम्हारे विश्वास ने मेरे अंदर अपना घर कर लिया.अब आज क्या हुआ ? कुछ समझ नही आया ...जितने भी नकारात्मक विचार थे सब मन में एक केक करके आ रहे थे और अगर नहीं कुछ आया तो वो था तुम्हारा कोई किसी भी माँध्यम से सन्देश .न फोन आया , न कोई फोन पे मेसेज और न हों यहाँ फेसबुक में कोई खबर. तुम खुद भी नहीं मिले किधर भी . जब हर और अँधेरा घिरा लगे और उम्मीद कि कोई किरण जब हमें नज़र नहीं आती  है तो मन और दिल में ठन जाती है ..मन कहता है ऐसा है दिल कहता नहीं ऐसा कुछ नहीं है . अब किस बात पे यकीन कैसे आये कुछ समझ नहीं आता . बस एक उम्मीद और एक आस अब है पास...कि शायद ...हां शायद ही तो वह शब्द है जो अक्सर हमें एक उम्मीद देके चला जाता है भले ही उस उम्मीद के सहारे हम फिर अपना पूरा जीवन गुजार दें .

समय ..११ .४३ रात्रि दिनोंक ..३१/५/१३ 

Monday, April 8, 2013

ध्वस्त होते रिश्ते


क्या हुआ है  आज कल लोगो कि मानसिकता को ?
..क्यों इनती कुत्सित मानसिकता वाले लोग इस समाज में मुह उठाये घूम रहे है ? आप सोच रहे होंगे कि में ये लिख क्या रही हूँ ..तो शायद आप भी येही कहेंगे जो मैंने कहा यहाँ कि सच में समाज दिग्भ्रमित होकर चल रहा है..अपने मूल्यों को खोकर कोई समाज कब तक जिन्दा रह सकता है..उसकी मौत निश्चित है .
होने को तों आये दिन ऐसा कुछ न कुछ समाज में घटित हों ही रहा है ..पर कल और आज फिर कुछ घटनाये ऐसी पढ़ी अखबार में कि मन बैचैन हों उठा. क्यों समाज में सारे रिश्ते नाते ध्वस्त होकर सिर्फ़ एक नाता बचा रह प् रहा है वो है स्त्री और पुरुष का. कल के अखबार में बहु और ससुर के रिश्ते को  कलंकित करती खबर पढ़ी , एक बाप बेटी के रिश्ते के ध्वस्त होते प्रतिमान कि खबर पढ़ी  , दोस्ती के रिश्ते को बदनाम करने वाले दोस्त कि खबर पढ़ी ..और आज फिर एक बाप ने ही अपने दोस्त के साथ मिलकर अपनी ही बेटी को शर्मशार किया ये खबर जब पढ़ी तों दिमाग ने जैसे कम ही करना बंद कर दिया. में सोचने लगी उस लड़की कि हालत के विषय में जिसके अपने पिता ने अपने दोस्त के साथ मिल कर उसके साथ दुष्कर्म किया और उसको धमकाया भी . एक लड़की के लिए उसका पिता या भाई उसके रक्षक होते है जिनके साये में वो सुकून से बढ़ सकेगी ऐसा उसका और घर वालो का मनना  होता है. पर जब वो रक्षा करने वाला उसकी अस्मत कि धज्जिया उदा देता है तब उसका अस्तित्व एक लड़की के रूप में उसको ही धिक्कारता है ..कि क्यों उसने एक लड़की का जन्म लिया ? पर क्या ये उसके लड़की होने का कसूर् है? क्या उसके अस्तिव का कोई महत्व ही नहीं है ? क्यों एक रिश्ता सिर्फ़ पुरुष मए तब्दील हों जाता है ..ये मेरी समझ से परे है ..और मेरी समझ में सिर्फ़ एक बात आती है कि जब भी कोई रिश्ते को दरकिनार कर किसी भी रिश्ते को कलंकित करे उसको सज़ा ए  मौत के सिवाय कोई सज़ा न दी जाये. ...वरना हम अपनी गरिमा के साथ साथ इस पूरे समाज को नष्ट  होते देखने  को मजबूर होंगे.