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Tuesday, January 6, 2015

स्क्रबर

प्लेट और अन्य बर्तन काना फूसी कर रहे थे और स्क्रबर को देख कर हँस रहे थे (जिससे बर्तन पर सफाई की जाती है ).
स्क्रबर ने प्लेट और अन्य बर्तनों से कहा - की तुम सब मुझे देख कर क्यों हस रहे हो , सबने कहा - तुम कितने गंदे दिख रहे हो ?




तब स्क्रबर बोला- तुम्हें घिसता हूँ तो खुद को गन्दा करता हूँ पर मुझे तसल्ली इस बात की है की मैं मेरा काम इमानदारी से अच्छी तरह कर रहा हूँ और आप सबको नयी जैसी चमक दे रहा हूँ . 
उसकी बात सुन कर बर्तन झेंप गये ..सही बात तो ये थी वो जिस चमक पर इतरा कर हसे वो चमक स्क्रबर से ही मिली थी उन्हें. 
सखी सिंह

Sunday, November 30, 2014

दिसम्बर2014 की दस्तक

दिसम्बर यानी साल का अंतिम माह समय की धार के साथ बहता इधर आ निकला ..तो इस साल २०१४ का अन्तिम माह भी दस्तक दे चुका है...सुबह का सूरज सुनहरी किरणों के साथ अपने रंग इस धरा पर बिखेर सब कुछ सुनहला कर देगा .
एक एक कर सारे महीने समय के द्वार से निकल गए और बस गए अतीत के सागर या खँडहर में जाकर छिप गए . समय की गर्त के बाहर कभी कभी निकलने का प्रयास होगा भी इनका तो कुछ पल को ही होगा ऐसा  . ये इतिहास के पन्ने भर चले माह , खट्टे मीठे रहे. सभी के साथ यही कहानी होगी ..कहीं अश्कों की बारिश कही मुस्कान सुहानी होगी . साल का ये अंतिम माह भी सबका अच्छा गुजरे ये दुआ है भगवान् से ..और नया साल सभी के लिए खुशिया लाये ये दिल की तमन्ना है . आमीन

Saturday, September 27, 2014

रेत

रेत उडकर जब भी बदन से आके लिपटती है ..तो अनेको नाम भी उड़कर बदन पर गिर चिपक जाते है और थोड़ी देर में झड जाते है



ये धुली सी रेत कह रही है....कबका धुल गया है वो एक तेरा नाम , जो इस साहिल पे लिखा था कभी ...@ 

सखी सिंह 

ye dhuli si ret kah rahi ..kab ka dhul gya hai wo ek tera naam jo is sahil pe likha tha kabhi . 

Sakhi Singh

फोटो -मृणाल शेखर

Friday, April 11, 2014

मन के भाव

हम बात करते है ..निश्छलता की....उम्मीद ये करते है की ..सबका प्यार हमारे लिए निश्छल हो ...पर क्या खुद  किसी से निश्छल प्रेम करके देखा?
हम्बात करते है कुटिलता की ..दुहाई देते है अक्सर हम लोगो के मन में बसी कुटिलता की ..और कहते है की देखो कितना मक्कार है ...पर क्या हम अपने मन की कुटिलता को दूर कर सबके लिए अपना मन  निर्मल रखते है ?
और पता है हमारे अन्दर की सबसे बड़ी  कमी क्या है? ....हम जैसा खुद नहीं करते है बिलकुल वैसा खुद के लिए करने की दुसरो से उम्मीद लगाये बैठे रहते है ...क्या है ये?...१.२५ ऍम ..१२/४/१४

Saturday, August 10, 2013

sukoon..सुकून

अगर शब्द है तुम्हारे पास तो सुकून है
मेरा सुकून खो जाता है जब शब्द नहीं होते

agar sahbd hai tumhare pass to sukun hai
mera sukoon kho jata hai jab shabd nahi hote....12.50 am...11/8/13

रंग के मौसम

तुम्हारे जैसे रंग के मौसम मुझे बहुत पसंद  है ..उसने जब मुझसे कहा में बहुत जोर से हस दी . 
मेरे जैसे रंग के मौसम ? क्या मतलब है तुम्हारा मैंने हस्ते हुए ही पूछा .
तब जैसे उसके चेहरे पर मौसम का रंग आकार टिक गया और एक हल्का सा खुमार आँखों में भरते हुए  उसने कहा था मुझसे कि जैसे ये मौसम है न सावन में कभी गिला सा है, कभी पतझड़ सा बेनूर और कभी बसंत  सा पुरनूर ..वैसे ही तो तुम भी हों एक पल में सावन की तरह आँखों से बारिश करती हुई , कभी उदास चेहरे पर पतझड़ का आलम लाती हुई और कभी हसती आंखे..गुलाबी गाल और इन्द्र धनुषी रंग बिखराती हुई तुम..क्या इन रंग बदलते मौसमों से कमतर हों ..और मैं अवाक सी इन बातो को सुन उनमे घुली जा रही थी ..कि शायद कोई और मौसम मेरे भीतर बस जाए.
फिर मुझे अहसास हुआ ये मौसम और जीवन दोनो तो एक ही जैसे है जो मुझे एक दूसरे से जोड़े रखते है . 12. 4 am...11/8/13

Tuesday, August 6, 2013

शब्द

अक्सर जब मन उलझनों में जकड़ने लगता है ...तब शब्द संबल बन 

जाते है और आकर कहते है ..सब कुछ कर सकते है जब हम साथ हों 

..शब्दों का कमाल देखो फिर से सारी उलझाने जैसे दूर भागने लगती है 

..और नयी स्फूर्ति के साथ कदम आगे बढ़ने लगते है ..शुक्रिया इन 

शब्दों का जो एक पल में सारी मुश्किलों से दूर मुझे ले जाते है .