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Friday, February 10, 2012

कुछ खुशिया

हां हां सब जानते है तेरे बारे मैं  कि तू  कैसी है.
अच्छा  क्या जानते है सब मेरे बारे में बताओ जरा ,में भी तो जानू  जो सब जानते है?

रहने दे ......
क्या रहने दूँ  ? मुझे बताओ न क्या जानते है सब .
ये  कह कर आशा ने गौर से अपने पति का मुह देखा और उसकी तरफ से किसी उत्तर कि प्रतीक्षा करने लगी.
 पर उसका पति दूसरी तरफ मुह करके बैठ गया .
तब आशा ने  अपनी मालकिन नीमा  से (जिनके घर में वो रहती थी ) कहा - दीदी मुझे ऐसे ही बोलता है ये .
नीमा  ने तब बोला क्यों बोलते हो ऐसे तुम इसको?
तब उसका पति शांत रहा कुछ नहीं बोला .
ये उनकी अक्सर होने वाली लड़ाइयों में से एक दिन का दृश्य था .
आशा जो कि एक मुश्लिम लड़की थी 'आयशा' जिसने अपनी मर्ज़ी से शादी कि थी और  वो भी एक हिंदू लड़के से.
सबकी मर्ज़ी के खिलाफ  जाके,  उसने घर से भागकर दूसरे शहर में जाकर शादी की थी ,ये सोच कर कि उसकी दुनिया प्यार से भरी रहेगी , 
अपने  प्यार के लिए अपना धर्म नाम सब बदल लिया .
लेकिन हुआ क्या? वो बैठी सोच रही थी और अपने नसीब को कोस  रही थी .
जिसके लिए घर वाले छोड़े वही इंसान उसके बारे में गलत बातें सोचता है .
वो बस और कुछ न कर सकी ..सिवाय आंसु बहाने के.
उसकी  दुनिया अब थी दो बच्चे और पति . रोज काम पर जाना और घर का काम सुबह शाम . और पति , जब मर्ज़ी हुई काम  किया, वरना घर में आराम किया.
और आशा फिर उसी पति कि हर ख्वाहिश पूरी करने के लिए जुट जाती अपने  घर में कुछ खुशिया जुटाने कि खातिर .









Friday, February 3, 2012

हिंदी में बात क्यों नहीं करते दिल्ली के लोग



हिंदी में बात क्यों नहीं करते दिल्ली के लोग, यह लिम्का बुक ऑफ रिकॉ‌र्ड्स के 23वें संस्करण में पीपुल ऑफ द ईयर से नवाजे जाने के बाद आशा भोंसले ने हिंदी में भाषण देते हुए कहा कि उन्हें इस बात का बहुत आश्चर्य है कि दिल्ली के लोग हिंदी में बात नहीं करते हैं। आशा जी का वक्तव्य था - कि मुझे लगता था कि दिल्ली में लोग हिंदी पसंद करते होंगे और इसी भाषा में बात करते होंगे। हालांकि मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि दिल्ली में भी लोग हिंदी की बजाय अंग्रेजी में बात करना ज्यादा पसंद करते हैं। आशा भोंसले ने अपना पूरा भाषण हिंदी में ही दिया। उन्होंने कहा कि लिम्का बुक ऑफ रिकॉ‌र्ड्स द्वारा सम्मानित किए जाने से वे बहुत खुश महसूस कर रही हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें खुशी है कि लोगों ने उनके हिंदी में दिए गए भाषण को समझा। अब उनको हम कैसे समझाए, कि जो दिल्ली हमारी राजधानी है वहाँ पर अधिकतर लोग अंग्रेजी को ही सामान्यतः क्यों आपस में बात-चीत का माध्यम बनाते है. जबकि हमारी सरकार कितने प्रयास हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए करती . हमारे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र नॉएडा, ग्रेटर नॉएडा, फरीदाबाद या फिर राजधानी दिल्ली में अधिकांशतः लोगो का सवांद सूत्र स्थापित करने का माध्यम अंग्रेजी है और वो लोग आपस में अंग्रेजी में सवाद स्थापित कारके अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते है. हिंदीभाषी व्यक्ति उनके लिए उस अचरज के समान है, जो ना जाने किस गवई माहोल से उठकर उन तक पहुँच गया हो. यह कहा कि सोच है जो अपनी ही मात्रभाषा के प्रति हेय दृष्टि अपनाती है. सभी अपनी अपनी अंग्रेजी के द्वारा एक दूसरे पर रोब झाड़ने कि कोशिश में व्यस्त होते है ऐसे में यदि कोई अपनी मात्रभाषा को सामान देते हुए उसमे अपने विचार प्रकट करना चाहे तो भी लोगो को लगता है कि आ गए हिंदी का झंडा उठाने य इनको अंग्रेजी ज्ञान है नहीं तो हिंदी में हो गए शुरू भाषण अपना लेकर. कितना बोरिंग है हूह. पर क्या ऐसी मानसिकता रखना गलत नहीं  है भाई? अरे ठीक है आप अपने आपको अभिजात्य वर्ग का साबित करना चाहते हो तो क्या  सिर्फ अंग्रेजी आपको अभिजात्य वर्ग का साबित करने में सक्षम है. हमारी अपनी  भाषा में क्या इतना दम नहीं है ? क्यों फिर हमेशा किसी नौकरी के विज्ञापन में लिखा रहता है ..अंग्रेजी बोलने वाले को प्राथमिकता . अरे अपनी ही मात् भाषा को जब हम अपने घर में सम्मान  नहीं दे सकते है ; तो अपने आप को बहार किसी देश में  सम्मान मिलने के विषय में हम भला कैसे सोच सकते है. हम सबको आशाजी कि इस बात को गहनता  से सोचना चाहिए और अपनी भाषा हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग हेतु प्रयास करने चाहिए .

जय हिंद ! जय भारत


Monday, January 23, 2012

aaj ka din..neta ji ka janamdin

००.०७ ऍम.....२४/१/१२

आज का दिन ..अरे २४ जनवरी  कि नहीं  में २३   जनवरी कि बात कर रही हूँ.अर्थात नेता जी सुभाषचन्द्र बोसे का जन्मदिन . सुबह उठी और  सोचा हम सबको शुभकामनाए देते है और जिनका जन्मदिन याद करना चाहिए उनको भूल जाते है .तो बस फसबूक पर शुभकामनाये और फोटो पोस्ट किया. फिर आज एक समारोह में शिरकत करनी थी ..पर कुछ तबियत नासाज़ थी और कुछ काम थे कई और जगह भी दूर थी, तो सोचा में  नहीं जाउंगी उस समारोह में .मगर फिर जिनके यहाँ उस समारोह का आयोजन था उनका कॉल आया .कि इतनी बिजी मत बन सखी आ जा... कुछ देर के लिए ही सही....हम सब इंतज़ार कर रहे है ..ये... वो...फिर मैंने बनाया प्लान..कि सिस्टर काम देखेंगी और में इस काम को करुँगी .

सुबह ११ बजे घर से निकली और रात को ७.४५ पर घर आई और बस दौड़ती रही सारा दिन . दिन अच्छा था..सुकून था ...पर सबसे अहम था वो रास्ता देखा जिसपे शायद पहले कभी गयी थी तब वो इतना अच्छा न था. आज उसपे जाना सुखद अहसास था .
मन हुआ बस चलती रहू इस रास्ते पर.लेकिन पहले समारोह में पहुँचने कि जल्दी थी फिर इंस्टिट्यूट पहुँचने कि जल्दी. क्योकि २६ जनवरी के प्रोग्राम्स भी तेयार कराये जा रहे है वो तेरे देखनी थी.
आज जाना कि दौड़ भाग में भी कभी सुकून मिलता है वो कैसे मिलता है .
कुछ पाल आये जब लगा अरे आराम करना था मुझे आज, लेकिन  फिर लगा चलो ठीक है इसी बहाने ये रास्ता देख लिया .
कूल मिला कर एक अच्छा दिन रहा आज का दिन..जो कुछ यादें कुछ बातें..कुछ जिंदगी कि फलसफे बता गया , हमें जीना सिखा गया.बंद लिफाफे में रखे खत सा दिन सारा जब गुजर गया ...दिल में बनके कुछ अहसास दिन ये पूरा उतर गया.



Sunday, January 22, 2012

दिल ढूंढता है

आज रविवार २२/१/२०१२ है समय १.२० दिन के .
आज  लगा कि जैसे कुछ सुकून के पल शायद आज मिल ही जांयेंगे . वरना कहा होता है अक्सर ऐसा जब दो पाल मिलते हो ऐसे जिनमें बस रहत कि सांसे हो.
आज कल जिंदगी में इतनी दौड हो गयी है हर पाल कोई काम इस दिमाग में दौड़ता है . कभी ये रह गया पूरा नहीं हुआ कभी अरे ये काम अभी करना शुरू करना है .
और सबकी शिकायते तुम कभी खाली नहीं रहती हमेशा कोई काम लिए उसी में उलझी रहती हो .
पर में भी क्या करूँ ? जब कोई काम नहीं होता था तब सोचती थी क्या करूँ और अब सोचती हू कैसे कुछ पल सुकून भरे दिन में चुनु .
सच है समय कभी एक सा नहीं रहता कभी हम इसके आगे कभी ये हमारे आगे .
पर अच्छा है व्यस्त रहने में भी के अलग ही मज़ा है .
कल का दिन भी  ही कुछ  अलग सी यादें देकर गया था..कई दिनों  कि लगातार चल रही  वेचैनी को कल रहत कि सांस जो मिली थी. शायद उसी कल का नतीजा ये निकला कि आज का सूरत सुकून भरी धुप खिलाता नज़र आ रहा था .मन खुश है ..क्यों अब कुछ बातें खुद भी सही सही नहीं कही जा सकती है कई बार है न???
खैर सबसे अच्छी बात बताऊ क्या है ??? मन में इस वक्त कोई हलचल नहीं है..बस ये है कि जो करना है आराम से करना है आज के दिन....क्योकि दिल ने ढूँढ  ही लिए है आज कुछ सुकून भरे फुर्सत के पल.

Sunday, December 4, 2011

सदा बहार देव जी को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए

ek sadabahar abhineta ka behad khubsurat andaaz


अब हम दिसम्बर २०११ के दरवाजे मैं  प्रवेश कर चुके है और इसके पार जाकर हम २०१२ में प्रवेश कर जायेंगे अर्थात ये साल अब हमसे विदा लेने को तेयार हो चुका है . इस साल ने हमें बहुत कुछ दिया जिसको हम ताउम्र याद रखेंगे किन्तु इस साल ने जाते जाते जो हमसे लिया उसको शब्दों में पूरी तरह ब्यान करना नामुमकिन है. इस साल २०११  ने कला और संगीत कि दुनिया में जो रिक्तता उत्पन्न कि है उसको भर पाना शायद मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा है. एक के बाद एक अपनी अपनी कला में निपुण लोगो का इस दुनिया से विदा लेना इस बात का इशारा कर रहा है कि ये साल हमारी सुपरिचित हस्तियों को हमसे जुदा कर अपने साल ही ले जाना चाहता है. इस साल २०११ को न जाने क्यों इन सबसे इतना प्यार हुआ कि इन सबको अपने साथ ले जा रह है.ये रहेंगे तो ताउम्र लेकिन अपनी कला के जरिये हम सबके दिलो में.
आज जब पता लगा कि अपनी फिल्मी दुनिया के एक स्तंभ देवानंद जी नहीं रहे तो दिल को एक और झटका लगा. उनके जाने से सदाबहार सिनेमा जगत में कुछ पल को सन्नाटा छा गया हो. उनके साथ ही फिल्मी दुनिया का एक अध्याय खतम हो गया या कहे एक युग उनके साथ ही चला गया. वो भी एक ऐसा स्वर्णिम युग है देवानंद जी का युग, जिसने अपने समकालीन, वर्तमान और आने वाले दिनों में फिल्मी जगत से जुड़े कलाकारों को बहुत कुछ सिखाने का काम किया और करेगा. एक निर्देशक कि तरह देवानंद जी कि फिल्मे सभी को राह दिखाएंगी या सवारेंगी . १९४९ वो समय था जब भारत ने खुली हवा में सास लेना सिखा ही था और नौजवान कुछ नया करने की कोशिश में लगे हुए थे. उसी समय युवा देव जी ने अपने भाइयो के साथ मिलकर अपनी प्रोडक्शन कंपनी नवकेतन कि शुरुआत की. जिसके बैनर तले देव जी कई कालजयी फिल्मो का निर्माण कार्य संपन्न किया. देवानंद जी ने अपने फिल्मी सफर में बहुत कुछ ऐसा किया जो सबके लिए अनुसरण करने लायक बन गया था . उनके तरह के बाल रखने का स्टाइल हो या उनके स्टाइल में पतलून पहनने का स्टाइल. सब कुछ लोगो को बहुत भाया और इसलिए लोगो ने उनके उन सब स्टाईल को आगे बढकर दिल खोल कर अपनाया .इस लिए उनको ट्रेंड सेटर कहना भी गलत नहीं होगा . उन्होंने बहुत सी फिल्मो में काम किया . ३१ फिल्मो का निर्माण किया और १९ फिल्मो का निर्देशन किया था . फ़िल्मी दुनिया के कई  उम्दा कलाकारों को, फिल्मो में लाने का सारा श्रेय देवानंद जी को ही जाता है . इनमें से जॉनी वॉकर, जीनातमान , टीनामुनीम (जिनको कि अब सभी टीना अम्बानी के नाम से जानते है) प्रमुख नाम है. देवानंद जी को उनके द्वारा अभिनीत फिल्म “कालापानी” और “गाइड” के लिए दो बार फिल्म फेयर पुरुस्कार प्राप्त हुआ .  देवानंद को २००१ में पद्मभूषण और २००२ में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया.
एक  अभिनेता, निर्देशक तथा निर्माता के रूप में देवानंद जी कि  प्रतिभा समय समय पर सामने आयी। उनके निधन से अपूरणीय क्षति हुई है। हमारी और से उनको भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित है. 'उन्हें हमेशा हिंदी सिनेमा के सदाबहार नायक के रूप में याद किया जाएगा।'

Saturday, November 5, 2011

भावभीनी श्रधांजलि भूपेन हजारिका जी को

ओ गंगा बहती हो क्यों ............................

  • विस्तार है अपार, प्रजा दोनो पार, करे हाहाकार, निःशब्द सदा, ओ गंगा तुम, ओ गंगा तुम. .. ओ गंगा… बहती हो क्यूँ ..
    नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई, निर्लज्ज भाव से बहती हो क्यूँ. . . .
    इतिहास की पुकार, करे हुंकार, ओ गंगा की धार, निर्बल जन को सबल संग्रामी, समग्रगामी. . बनाती नही हो क्यूँ. . . .
    विस्तार है अपार, प्रजा दोनो पार, करे हाहाकार, निःशब्द सदा, ओ गंगा तुम, ओ गंगा तुम. .. ओ गंगा… बहती हो क्यूँ . ..

    अनपढ़ जन अक्षरहीन अनगिन जन खाद्यविहीन निद्रवीन देख मौन हो क्यूँ ?
    व्यक्ति रहित व्यक्ति केन्द्रित सकल समाज व्यक्तित्व रहित निष्प्राण समाज को छोडती न क्यूँ ?
    रुतस्विनी क्यूँ न रही ? तुम निश्चय चितन नहीं प्राणों में प्रेरणा प्रेरती न क्यूँ ?
    उन्मद अवनी कुरुक्षेत्र बनी गंगे जननी नव भारत में भीष्म रूपी सूत समरजयी जनती नहीं हो क्यूँ ?


एक गम से छुटकारा मिला नहीं एक दूसरे दुःख ने आकर घेर लिया.
इसके पहले जो पोस्ट किया वो भी दुःख भरी खबर थी और अज भी फिर से में भुपने दा के ना रहने कि खबर के साथ दुखी मन से ये पोस्ट कर रही हूँ. बहुत दुःख हो रह है कुछ  दिन के अंतराल पर ही दो कालजयी आवाजो के मालिकों के ना रहने का .आवाजो के मध्यम से यूँ तो वो सदैव हमारे बीच जीवित है किन्तु दुःख इस बात का भी है कि उन आवाजो के अब कोई नयी रचना रचित होकर नहीं गूंजेगी.
भूपेन दा जहाँ भी हो भगवन उनकी आत्मा को शांति दें.
मुझे याद आ रहा है एक उनका अमर गीत.....

ना कहो कोई में अकेला हूँ ...में और मेरा साया दो है दोनों है

बस अभी इतना ही कह पा रही हूँ फिर आउंगी इन दोनो महान कलाकारों के बारे में कुछ बाते कहने .


आभार सखी