दोस्तों मेरे कुछ ख्याल या अहसास जिनको में कविता का रूप देना नहीं चाहती हूँ , वो आपके सामने में यहाँ कहानी या लेख के रूप में लेकर आती हूँ ताकि में उस ख्याल या अहसास के साथ इन्साफ कर सकूँ या ये कहू की जिससे वो अपनी सही पहचान पा सके..
Sunday, July 25, 2010
सुसाइड /आत्महत्या
Friday, July 9, 2010
औरत..अस्तित्व का प्रश्न

सुबह सुबह अखबार पढ़ने के लिए आज जब बैठी, पन्ना दर पन्ना एक निगाह डालते हुए अंदर के पन्ने तक पहुंची. अचानक एक खबर पर जा कर निगाह मेरी अटक गयी , जो की लिंग परिवर्तन से सम्बंधित थी. ऐसा नहीं था की आज से पहले लिंग परिवर्तन की कोई घटना पेपर मे न पढ़ी हो, मगर इस बार जो कारण पेपर में मैंने पढ़ा वो मेरे लिए बहुत चौकाने वाला था.खबर कुछ इस प्रकार थी कि –“ घर वालों के दवाब में आकर शादी न करनी पड़े, इसलिए एक महिला ने अपना लिंग परिवर्तित करा लिया.उस महिला के अनुसार इस पुरुष प्रधान देश में कोई भी महिला अपनी मर्ज़ी से बिना शादी किये नहीं रह सकती है. अगर वो शादी न भी करना चाहे तो उसे घर वालों के दवाब में आकर सिर्फ इसलिए शादी करनी पड़ती है क्यों कि घर वालों को समाज का डर सताता रहता है, कि उनकी बहन या बेटी अगर शादी नहीं करेगी तो समाज क्या कहेगा या समाज में तरह तरह कि बातें न फैले. इसलिए वो लड़की के मर्ज़ी के बगैर जबरदस्ती समाज के दर से उसकी शादी करा देते है. अतः उसने परिजनों को बिना सूचित किये अपनी मर्ज़ी के मुताबिक जिंदगी जीने के लिए अपना लिंग परिवर्तित कराया ताकि वो बिना किसी पुरुष के सहारे आराम से अपनी जिंदगी जी सके.”
इस घटना से मैं ये सोचने पर मजबूर हो गयी की ये घटना समाज का मार्गदर्शन कर दिशा मे समाज को लेकर जायेगी? कहीं इस प्रकार की इक्छा रखने वाली लड़किया इस घटना से प्रेरित हो अपना लिंग परिवर्तन करा खुद को इस पुरुष प्रधान समाज का हिस्सा न बना ले. मैं इस घटना की समर्थक तो नहीं मगर इस घटना को लेकर संजीदा जरुर हूँ. उस लड़की की क्या मनोदशा रही होगी –जिसने घर वालों के दवाब में आकर शादी न करनी पडे सिर्फ इसलिए अपनी पहचान ही बदलवाना उचित समझा. उसकी मनोदशा को मे समझने का एक छोटा सा प्रयास मैं कर ही रही थी की शाम होते होते एक और आम सी हो चुकी मगर महत्वपूर्ण घटना ने मुझे फिर सोचने पर मजबूर कर दिया .
हुआ ऐसा की शाम को मेरी एक परिचित से मेरी मुलाकात हुई , बोली दीदी मे कल छुट्टी पर रहूंगी.
मैंने कारण जानना चाहा पूछा : क्या हुआ ?
अपने पेट की (प्रेग्नेंट थी वो ) तरफ इशारा कर बोली :- इस चक्कर में
मैंने कहा :- सब ठीक तो है ??
वो बोली :- जरा चेक करना है
मैं बोलो :- वो तो आप यहाँ भी करा सकती हो ..
तो उसने कहा :- हां , यहाँ करा तो सकती हूँ, मगर मुझे कुछ और चेक करना है
मैंने फिर कहा :- लड़का है या लड़की ये पता करना है क्या??
उसने हाँ में सिर हिला दिया .
मैं एक दम अचंभित हो गयी .
मैंने उससे कहा:- क्या जरुरत है ऐसा कराने की ? और ऐसे भी ऐसा करना अपराध है.
तो वह बोली :- एक लड़की तो है ही मेरी और मेरी पड़ोसन ने उस जगह टेस्ट कराया था. लड़की थी.
मैं बोली:- थी मतलब अब नहीं है ?
वह बोली :- नहीं अब नहीं है.
मैंने फिर उसे समझाने के मकसद से कहा :- अगर एक औरत ही लड़कियों को जनम नहीं लेने देगी तो किसी और को या पुरुषों को क्या दोष देना.
इन दोनो ही घटनाओ से इस ओर इशारा होता है की हमारे समाज में औरतों की दशा किस कदर बदतर है. औरत ही जब सिर्फ पुरुष के वर्चस्व को मान दे रही है तो फिर उसी इस दशा के लिए हम किसी और पर दोषारोपण कैसे कर सकते है. सरकार या गैर सरकारी संगठन कितना भी कन्या भ्रूण हत्या को रोकने का प्रयास कर लें , मगर चोरी छिपे ये घृणित कार्य आज भी समाज में हो रहा है और इसे करने वाली और करने वाली दोनो ही महिलाये है. जब तक एक-एक औरत अपना महत्व नहीं समझेगी तब तक कोई पुरुष भला उसे क्या महत्व देगा.
मैंने उस महिला को अपने स्तर से समझाया , मगर उसकी समझ में क्या और कितना आया ये तो वह ही जाने. मगर इन दोनो ही घटनाओ ने मुझे अवश्य दुखी कर दिया; की जहाँ एक ओर लड़किया अपने ही अस्तित्व को बरक़रार रखने के लिए खुद को एक अहम मुकाम तक लाना चाह रही है वहाँ महिलाये ही अपने अस्तित्व के साथ खिलवाड भी कर रही है.