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Friday, July 9, 2010

औरत..अस्तित्व का प्रश्न


सुबह सुबह अखबार पढ़ने के लिए आज जब बैठी, पन्ना दर पन्ना एक निगाह डालते हुए अंदर के पन्ने तक पहुंची. अचानक एक खबर पर जा कर निगाह मेरी अटक गयी , जो की लिंग परिवर्तन से सम्बंधित थी. ऐसा नहीं था की आज से पहले लिंग परिवर्तन की कोई घटना पेपर मे न पढ़ी हो, मगर इस बार जो कारण पेपर में मैंने पढ़ा वो मेरे लिए बहुत चौकाने वाला था.खबर कुछ इस प्रकार थी कि –“ घर वालों के दवाब में आकर शादी न करनी पड़े, इसलिए एक महिला ने अपना लिंग परिवर्तित करा लिया.उस महिला के अनुसार इस पुरुष प्रधान देश में कोई भी महिला अपनी मर्ज़ी से बिना शादी किये नहीं रह सकती है. अगर वो शादी न भी करना चाहे तो उसे घर वालों के दवाब में आकर सिर्फ इसलिए शादी करनी पड़ती है क्यों कि घर वालों को समाज का डर सताता रहता है, कि उनकी बहन या बेटी अगर शादी नहीं करेगी तो समाज क्या कहेगा या समाज में तरह तरह कि बातें न फैले. इसलिए वो लड़की के मर्ज़ी के बगैर जबरदस्ती समाज के दर से उसकी शादी करा देते है. अतः उसने परिजनों को बिना सूचित किये अपनी मर्ज़ी के मुताबिक जिंदगी जीने के लिए अपना लिंग परिवर्तित कराया ताकि वो बिना किसी पुरुष के सहारे आराम से अपनी जिंदगी जी सके.

इस घटना से मैं ये सोचने पर मजबूर हो गयी की ये घटना समाज का मार्गदर्शन कर दिशा मे समाज को लेकर जायेगी? कहीं इस प्रकार की इक्छा रखने वाली लड़किया इस घटना से प्रेरित हो अपना लिंग परिवर्तन करा खुद को इस पुरुष प्रधान समाज का हिस्सा न बना ले. मैं इस घटना की समर्थक तो नहीं मगर इस घटना को लेकर संजीदा जरुर हूँ. उस लड़की की क्या मनोदशा रही होगी जिसने घर वालों के दवाब में आकर शादी न करनी पडे सिर्फ इसलिए अपनी पहचान ही बदलवाना उचित समझा. उसकी मनोदशा को मे समझने का एक छोटा सा प्रयास मैं कर ही रही थी की शाम होते होते एक और आम सी हो चुकी मगर महत्वपूर्ण घटना ने मुझे फिर सोचने पर मजबूर कर दिया .

हुआ ऐसा की शाम को मेरी एक परिचित से मेरी मुलाकात हुई , बोली दीदी मे कल छुट्टी पर रहूंगी.

मैंने कारण जानना चाहा पूछा : क्या हुआ ?

अपने पेट की (प्रेग्नेंट थी वो ) तरफ इशारा कर बोली :- इस चक्कर में

मैंने कहा :- सब ठीक तो है ??

वो बोली :- जरा चेक करना है

मैं बोलो :- वो तो आप यहाँ भी करा सकती हो ..

तो उसने कहा :- हां , यहाँ करा तो सकती हूँ, मगर मुझे कुछ और चेक करना है

मैंने फिर कहा :- लड़का है या लड़की ये पता करना है क्या??

उसने हाँ में सिर हिला दिया .

मैं एक दम अचंभित हो गयी .

मैंने उससे कहा:- क्या जरुरत है ऐसा कराने की ? और ऐसे भी ऐसा करना अपराध है.

तो वह बोली :- एक लड़की तो है ही मेरी और मेरी पड़ोसन ने उस जगह टेस्ट कराया था. लड़की थी.

मैं बोली:- थी मतलब अब नहीं है ?

वह बोली :- नहीं अब नहीं है.

मैंने फिर उसे समझाने के मकसद से कहा :- अगर एक औरत ही लड़कियों को जनम नहीं लेने देगी तो किसी और को या पुरुषों को क्या दोष देना.

इन दोनो ही घटनाओ से इस ओर इशारा होता है की हमारे समाज में औरतों की दशा किस कदर बदतर है. औरत ही जब सिर्फ पुरुष के वर्चस्व को मान दे रही है तो फिर उसी इस दशा के लिए हम किसी और पर दोषारोपण कैसे कर सकते है. सरकार या गैर सरकारी संगठन कितना भी कन्या भ्रूण हत्या को रोकने का प्रयास कर लें , मगर चोरी छिपे ये घृणित कार्य आज भी समाज में हो रहा है और इसे करने वाली और करने वाली दोनो ही महिलाये है. जब तक एक-एक औरत अपना महत्व नहीं समझेगी तब तक कोई पुरुष भला उसे क्या महत्व देगा.

मैंने उस महिला को अपने स्तर से समझाया , मगर उसकी समझ में क्या और कितना आया ये तो वह ही जाने. मगर इन दोनो ही घटनाओ ने मुझे अवश्य दुखी कर दिया; की जहाँ एक ओर लड़किया अपने ही अस्तित्व को बरक़रार रखने के लिए खुद को एक अहम मुकाम तक लाना चाह रही है वहाँ महिलाये ही अपने अस्तित्व के साथ खिलवाड भी कर रही है.

फोटो साभार :- लिसा फित्तिपल्दी

43 comments:

रश्मि प्रभा... said...

shayad yah prashn bana hi rahega, samaaj ki soch kitna baadhy karti hai

Indian The Great people said...
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Indian The Great people said...

"Sawal na sirf samaj se balki hamari apni rozmarra ki avdharnoun se jude hain, jawab shyad wahi jane jisne in sawalon ko banaya hai, Jab aapne yah khabar padhi lagbhag usi samaya hamara bhi isi or dhyan gaya tha, kuchh pal socha bhi lekin kisi ka vyaktigat prshan mankar ignore kar gaya, Dono hi ghatnyain apni or se ke bade lekin kutsit badlav ka sanket de rahi hain, siwaye khud ke kisi or se is sandarbh main ummid karna bhi bemani hai, " Achchha laga padhna

arun c roy said...

bahut gambhir sawal ched diya hai aapne ! shayad iska uttar kisi ke paas nahi ! jaise zindgi evolution ke process se yahan tak chal kar aayee hai.. aage behtar ho jaaye zindgi... khas taur par mahilaon ke liye ! aapke chinta aur chintan se sehmat hote hue ! shubhkaamna !

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

achha lekh.

kavi kulwant said...

aap ki samvedanao...ke prati natmastak hun..
with best regards kavi kuwlant
http://kavikulwant.blogspot.com

Dr. kavita 'kiran' (poetess) said...

BILKUL SAHI KAHA AAPNE sAKSHI. I AGREED.

राकेश कौशिक said...

पुरुष भी स्त्री को बराबर का मान दें लेकिन ज्यादा जरुरी है
"औरत ही जब सिर्फ पुरुष के वर्चस्व को मान दे रही है तो फिर उसी इस दशा के लिए हम किसी और पर दोषारोपण कैसे कर सकते है"

सहज और सरल - प्रेरक आलेख और उससे मेल खाता सुंदर चित्र - ब्लॉग भी आकर्षक लगा

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत प्रभावशाली लेखन...सच है पहले खुद को ही समझना होगा....

सुनील गज्जाणी said...

heelo .
sakhi !
kise dosh de hum ,naari hi swayam pe aatya char karne lage to kya kahege. naari jaha ek taraf paashchatya se prabhavit hoti jaa rahi hai to apni sanskariti se bhagti bhi jaa rahi hai , jo sukh apni kutiya me hai wo doosro ke mahal me nahi mil sakta,
naari maa banne ki bajay mom banne me zayada ruchi ?kyun rakhti hai haali chalan maha nanagron me zayada hai. kher ..
sadhuwad

वन्दना said...

यही तो सबसे बडी समस्या है………………औरत ही औरत की सबसे बडी दुश्मन रही है तभी तो इस दुर्दशा का शिकार है……………ना जाने कब सोच मे बद्लाव आयेगा।

अर्चना गंगवार said...

sakhi mere nazeriye se tu ager aaj nari hi nari ki sabse bari dushman hai......
1..bhurn hatya ke liye

2..jub dahej ke liye ek bahu jalti hai tu us gher ki nari kaha hoti hai

3..kitni baar parte hai hum ki ek larki kisi vivahit purush se shaadi ker leti hai ....aise mein 2 gher berbaad ho jate hai....kya uske liye vo larki zimmedaar nahi hoti hai....

Jai Narayan Tripathi said...

Bahut sahi lekh hai ...
Lekin mahilaon ke liye padhna jaroori hai

shikha varshney said...

क्या बात है ...बहुत सही कहा है .

रचना said...

the "conditioning" of woman by our society is responsible for all this

its wrong to say woman is responsible for all this or that aurat hi aurat ki dushman haen

दिव्य नर्मदा divya narmada said...

जबलपुर के अख़बारों में खबर है कि एक युवा लडके ने लिंग परिवर्तन कराकर खुद को लडकी बना लिये डॉक्टर द्वारा यह बताये जाने के बाद भी कि वह माँ नहीं बन सकेगा. उसका कथन यह है कि बह्च्पन से ही खुद को पुरुष नहीं महिला के रूप में अनुभव करता रहा है और शेष ज़िन्दगी स्त्री के रूप में जीना चाहता है. क्या उसके माता-पिता ने उसे नहीं रोका होगा? क्या इससे भी ऐसा कुछ निष्कर्ष निकालें जैसा आपने एक घटना से निकाला और अधिकांश पाठक हाँ में हाँ मिला रहे हैं. हम व्यक्ति को उसकी अपनी ज़िंदगी के बारे फैसला लेने का हक क्यों नहीं देना चाहते? क्या यह ज़रूरी है कि मैं जो करूँ वह आपको ठीक लगे या आप जो करें वह मुझे ठीक लगे. बेहतर है कि मेरा निर्णय मुझे और आपका निर्णय आपको ठीक लगे. एक गोत्र के लड़का-लडकी शादी करते हैं क्योंकि उन्हें उनका निर्णय ठीक लगता है, खप पंचायत क्यों अपना मत उन पर थोपे? ऐसे ही आप अपनी सोच उस महिला पर क्यों थोपें? वह बच्ची चाहे या बच्चा यह उसका अधिकार है... उसे ही सही-गलत तय करने दें. हम सचिन को बैटिंग का तरीका, दोनी को कप्तानी, हरभजन को गेंदबाजी, लिएंडर पेस को टेनिस, सायना नेहवाल को बैडमिन्टन खेलने की भी छूट नहीं देते, झट से अपनी राय थोप देते हैं... सामाजिकता के समान ही व्यक्तिगतता भी निहायत ज़रूरी है. किसी और के फैसलों को अपने चश्मे से देखें का हक किसने किसे कब दिया?....
Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

निर्मला कपिला said...

सहम्त हूँ आप अच्छा लिखती हैं । शुभकामनायें

Prem Farrukhabadi said...

aapke chinta aur chintan se sehmat hote hue. shubhkaamnayen !!!!!!

दिगम्बर नासवा said...

Ye sach hai .. aurat hi aurat ko samajh nahi paati .. purush samaaj ka dabaav itna adhik hai ki chaah kar bhi aurat ki sochne ki shakti khatm jo jati hai ...
Shayad aane wala samay hi is baat ka jawaab dega ...

जेन्नी शबनम said...
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जेन्नी शबनम said...

sakhi,
aapne jis ghatna ka zikra kiya hai, sochne se to bahut dukhad hai humaare samaj keliye. lekin agar aap us ladki ki manodasha samjhein to uske paas koi upaay nahin raha hoga siwa iske ki wo ling pariwartan karwaaye. ek aurat ka akele rahna bahut mushkil hai, agar aap chhote nagar mein hain to. bhale mahanagar mein jyada mushkil nahin hota. us se badhkar ghar mein uske apne mata-pita bina vivaah ka rahne nahi denge kyunki samaj ki oongli na sirf ladki par balki uske mata -pita par bhi uthegi. zinda aur bina vivaah ke rahne ka uske paas koi aur vikalp nahin raha hoga.
dusri ghatna to aam ho chuki hai. aur iska dosh kise dein? dahej, suraksha ye do mudde aise hain ki har maa(mother) saham jaati hai beti janm dene mein. jabtak saamaajik chetna aur soch nahin badlegi aisi ghatna hoti aai hai aur hoti rahegi. hum sabhi kitna bhi samjha lein shaaririk suraksha nahin de sakte.
bahut dukh hota hai ye sab dekhkar. koi hal bhi nahin sujhta. achha aalekh, badhai sakhi ji.

भगीरथ said...

a girl child is still aliability in indian society more over sexual morality is also gender based unless she becomes an asset and family,s honour is detached from her seual behaviour the position of women will remain vulnerable.
bhagirath

वाणी गीत said...

सबसे बड़ा दुःख यही है की अपना अस्तित्व मिटने में खुद महिलाएं ही सहयोग कर रही हैं ...

सार्थक पोस्ट ..!

मनोज कुमार said...

जगरूकता बढी है। पर ये दोनों घटनाएं चिंता पैदा करती हैं

Tarkeshwar Giri said...

AURAT HI AURAT KI SABSE BADI DUSMAN HAI.

SURINDER RATTI said...

सखी जी,
नमस्ते,
इस आधुनिक मशीनी युग में इंसान हर चीज़ का दुरूपयोग कर रहा है, आपने दो अलग-अलग विषय बताये ये सोचने को मजबूर करते हैं पहला लिंग परिवर्तन, इधर कुछ सालों से लोग पाश्चात्य देशों की नक़ल करने में लगे हुए हैं, शादी के डर से लिंग परिवर्तन ये कुछ अटपटा सा लगता है, कुदरत के साथ छेड़-छाड़ जैसा. कई लोगों में ऐसा देखा गया है एक दूसरा जीव भीतर ही भीतर पनपता रहता है वह पुरुष लड़की और लड़की लड़का बनना चाहता है ऐसे लोगों को विशेष ट्रीटमेंट की ज़रूरत होती है एक्सपर्ट्स डोक्टर की सलाह लेना चाहिए.
दूसरा आपने कहा की भ्रूण परिक्षण - ये अपराध है सभी जानते हैं फिर भी लोग ये जानने को उत्सुक रहते हैं लड़का होगा के लड़की, और जानने के बाद अगर वह लड़की है तो माँ ख़ुद ही उसे निकालने की बात करती है. ऐसे बहुत से अपराध हो रहे हैं भ्रूण ह्त्या हो रही है लोग लचीली कानून व्यवस्था का भरपूर लाभ उठा रहे हैं. नारी ममता की मूरत है यह नया रूप भविष्य में कैसा होगा ? ये सवाल भविष्य में भी सवाल ही रहेंगे.....सुरिन्दर रत्ती - मुंबई

नीरज गोस्वामी said...

जब तक एक एक औरत अपना महत्त्व नहीं समझेगी तब तक कोई पुरुष भला उसे क्या महत्व देगा?

एक दम खरी बात की है आपने...वाह...
नीरज

manoj said...

sakhi ji

samaaj ki es sachae ko bahut acchi tareh s apne likha hai ha y such hai ki AURAT HI AURAT KI SABSE BADI DUSMAN HAI.mager kya kare es bat ko koe samjhne ko ready nhi hie

Bahut hi accha likha hai apne sakhi ji esk liye mare shubhkamnae apne uske dard ko padha y ap hi ker sakte hai

sakhi with feelings said...

rashmi ji
sahi kaha samaaj ki soch hamko bandh ke rakh deti hai . aap ayee shukriya

sakhi with feelings said...

shukriya g8t indian ji

sakhi with feelings said...

shuikriya arun ji
'

sakhi with feelings said...

surendra ji aur kavita ji
bhaut bhaut shukriya

sakhi with feelings said...

rakesh ji..apko lekh , chitra aur blog pasand aaye acha laga jankar

************************************

sangeeta ji shukriya apne saraha

sakhi with feelings said...

sunil ji
abhi bhi bhaut si jagah nari us pashchatya sabhyta se anjaan hai aur ek andhre me jee rahi hai....
ye doino hi bate kahi na kahin hamari apni sanskriti ki den hai.
kyo ki pashchatya desho me koi ladki bina shadi ke akele rahe to koi kuch nahi kahta magar yaha sabhi ko aapti hoti hai ...aur isliye aise kadam uthaye jate hai jinka jikar kiya meine.
acha laga aap ayha tak aaye

sakhi with feelings said...

vandna ji
ye badlaav aane me abhi jamane lagenge ya kahe jab ye stri purush ka balance khatarnaak star tak bigad jayega tab shayad kuch sudhar ho .
shukriya aap yaha tak ayee

sakhi with feelings said...

archna ji
apne sahi kaha aurat ki durdsha ke liye kahi na kahi aurat hi jimeedar hai
1.
ek maa hi apni beti ko janam na dekar usase jeene ka hak chhinti hai

2.
dahej ke liye ek aurat hi milke sabke sath bahu ke rrop me ek aurat ko bedardi se jala deti hai

3.
ek auart hi apna ghar basane ke liye jab dusri aurat ka ghar ujhaad de..
ye saari ghatnaye yahi darshati hai aurat hi aurat ko satati hai

shukriya aa yaha ayee apni bat kahi

sakhi with feelings said...

jai ...aurton ne bhi pada hai./...
tumne waqt diya acha laga
shukriya

sakhi with feelings said...

sikha ji
shukriya

sakhi with feelings said...

rachna ji

society kisase milke bani hai ham sab se hi na..jisme aurate bhi shamil hai..aur jab ek aurat ko koi kuch karta hai dusri aurat usko bachane nahi aati balki usi bheed me khud bhi jakar shamil ho jati hai .
phir aurat bhi doshi hai na ek aurat ki barbadi ke liye

shukriya aap yaha tak ayee

sakhi with feelings said...

Acharya Sanjiv Salil ji

apne kaha ki ..."जबलपुर के अख़बारों में खबर है कि एक युवा लडके ने लिंग परिवर्तन कराकर खुद को लडकी बना लिये डॉक्टर द्वारा यह बताये जाने के बाद भी कि वह माँ नहीं बन सकेगा. उसका कथन यह है कि बह्च्पन से ही खुद को पुरुष नहीं महिला के रूप में अनुभव करता रहा है और शेष ज़िन्दगी स्त्री के रूप में जीना चाहता है. क्या उसके माता-पिता ने उसे नहीं रोका होगा? क्या इससे भी ऐसा कुछ निष्कर्ष निकालें जैसा आपने एक घटना से निकाला और अधिकांश पाठक हाँ में हाँ मिला रहे हैं. हम व्यक्ति को उसकी अपनी ज़िंदगी के बारे फैसला लेने का हक क्यों नहीं देना चाहते? क्या यह ज़रूरी है कि मैं जो करूँ वह आपको ठीक लगे या आप जो करें वह मुझे ठीक लगे. बेहतर है कि मेरा निर्णय मुझे और आपका निर्णय आपको ठीक लगे."
to jo jaisa chahe vaisa kar paye aisa kahha chah rahe ho ..tab maine bhi yahi kaha hai..ki agar wo ladki bina shadi kiye rahna chahti hai to kyo uske ghar wale is samaaj ke dar se shaadi karne ko majboor kar rahe they jisake karan usko apni pahchan bhi badalni padi.
ye baat to aapki bata se hi sapst hai apke mutabikk usko ye hak hai hi ki wo bina shadi kiye ijjat ke sath is samaaj me rah sake..ya sirh hak bhi purush ko hi mila hua hai jiske karan usane aisa kiya..taki purush roop me wo bina shadi kiye rahne ka hak pa sake.

apne phir kaha..." एक गोत्र के लड़का-लडकी शादी करते हैं क्योंकि उन्हें उनका निर्णय ठीक लगता है, "
manti hu apki baat..lekin yaha bhi samaaj ko hi aapti hoti hai aur unke faishle pe sawaal khade kar mamle ko tul de diya jata hai. aur aaj kal aise kai mamle samne aaye hai is prakar ke jab ladjke ladki doino ko jana se hath dhone pade hai.

apne kaha hai ki.." ऐसे ही आप अपनी सोच उस महिला पर क्यों थोपें? वह बच्ची चाहे या बच्चा यह उसका अधिकार है... उसे ही सही-गलत तय करने दें."
nirnay sahi galat kaa wo kare koi dikkat anhi hai..magar ek ladki ko janam dena kyo galat hai aur wo kyo janamke pahle usko maar de ye tark de aap...
agar har maa yahi karne lage to phir maa hongi hi kaise bas bachenge to purush hi purush..aur ek smaay ais aayega jab wo bhi nahi honge kyo ki usko janam dene wali hi nahi hogi jab koi.

हम सचिन को बैटिंग का तरीका, दोनी को कप्तानी, हरभजन को गेंदबाजी, लिएंडर पेस को टेनिस, सायना नेहवाल को बैडमिन्टन खेलने की भी छूट नहीं देते, झट से अपनी राय थोप देते हैं...
sachin ki baithing, dhoni ki kaptani , sayna ka bedmintan ye sab khel hai aur jo tareeka in sabko apne apne kheol khelne ka aata hai vaise hi wo sab khelte hai inko koi rok nahi skata..sachin 4 6 apne hi nadaj me lagate hai to sayna apne hi style me khelti hai badminton. inko koi nahi rokta khelne se aur khel aur jindagi doino ek se nahi hai..kyo ki kisi ki bhi jindagi bas khel bhar nahi hai.

apne kaha..." सामाजिकता के समान ही व्यक्तिगतता भी निहायत ज़रूरी है. किसी और के फैसलों को अपने चश्मे से देखें का हक किसने किसे कब दिया?...."
kisi ne kisi ko nahi diya aisa faishla ki koi aur kisi ke faisle ko apne chashme se dekhe..magar kuch bate aisi hoti hai jo samjaa ko prabhavit karti hai aur unko undekha karna khud ko dhoka dena hai ya to ya phir bhed chaal me shamil hona hai.

shukriya aapne apni raay di yaha..

sakhi with feelings said...

nirmala kapila ji
aur
Prem Farrukhabadi ji
shukriya aap yaha aaye

sakhi with feelings said...

दिगम्बर नासवा जी
औअर्ट की सोच को जब बांध ही दिया जाये तो क्या हो सकता ई भला...
अच लगा आप ने साथ दिया
शुक्रिया

upendra said...

very good thigs u have told...

very good