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Sunday, July 25, 2010

सुसाइड /आत्महत्या


सुसाइड /आत्महत्या ..आज जिधर देखो यही सुनायी दे रहा है की बच्चे ने माँ बाप द्वारा ड़ॉट दिए जाने पर सुसाइड कर ली, या फिर गर्ल फ्रेंड ने प्यार में धोखा दिया, तो आत्म हत्या कर ली, या फिर लड़की ने प्यार का निवेदन ठुकराया तो आत्मा हत्या कर ली. टीवी पर मनपसंद कार्यक्रम नहीं देखने दिया तो इस बात पे आत्मा हत्या कर ली....या परीक्षा में फेल हो गए तो खुद कि जान ले ली. क्या एक परीक्षा में फेल होना या एक लड़की द्वारा ठुकराया जाना या फिर एक टीवी प्रोग्राम अपनी पसंद का ना देख पाना आत्म हत्या करने के रास्ते पर ले जाये ऐसा होना चाहिए????

क्या आज जिंदगी इतनी सस्ती हो गयी है, कि एक जरा सी बात पर कोई भी आत्म हत्या करने पे उतारू हो जाता है.
पेपर में एक खबर पढ़ी:- “ गर्ल फ्रेंड के पिता ने किसी बात पे थप्पड़ मार दिया तो लड़के ने आत्महत्या कर ली. इस बात पर सोचने को मजबूर हो गयी मैं.
आज कल के बच्चो को माँ बाप क्या सिखा रहे है? जरा जरा सी बात किसी बच्चे से सहन नहीं होती. और एक जरा सी बात जान देने के लिए उकसा देती है इन आज कल के बच्चो को.
लेकिन बच्चे ही नहीं बड़े भी इसीप्रकार के कृत्य करने पर उतारू है. दो तीन दिन हुए टीवी पर समाचार देखते हुए पता लगा कि एक एस ड़ी ऍम ने आत्मा हत्या कर ली.
मैंने पहले इस बात पे इतना गौर नहीं किया..मगर जब आज एक परिचित ने मुझे फोन किया और बताया कि वो मेरी दोस्त के पिता थे और उनका पार्थिव शरीर आज लाया जा रहा है पोस्टमार्टम के बाद, तब बहुत दुःख हुआ. पहले एक पल को दुःख हुआ था, मगर अब दूसरी दोस्तों को भी बताया कि ऐसा हो गया है.
मतलब आज कल इन घटनाओ को सुनना और पढना इतना आम हो गया है कि हमें ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है ..क्यों कि हम सब अपनी जिंदगी में व्यस्त होते है. अगर कोई फर्क पड़ता है तो वो उस वक्त जब हमें उस इंसान के बारे में ये पता लगता है कि वो हमारी पहचान का था. तब दुःख होता है कुछ दिन और फिर सब वही पहले जैसा हो जाता है. हम फिर से अपनी अपनी जिंदगी में व्यस्त हो जाते है.

क्यों आज कल कोई किसी कि कोई बात सुनना नहीं चाहता है..जरा सा घर में माँ बाप कुछ कह दे या कोई कुछ कह दे सब जान देने को आतुर हो जाते हैं. क्या हमारा आने वाला कल इतना कमजोर हो गया है जो जरा भी सहनशीलता नहीं रखता है.फिर हम एक मजबूत कल कि उम्मीद कैसे कर ले इन कमजोर दिल के कल के कर्णधारों से.
क्या हमारा या हर माँ बाप का फ़र्ज़ नहीं बनता है कि इनको सहन शील बनाये ..और किसी भी बात पे तुरन्त मरने का ना सोचे ये सिखाए उस बात का मुकाबला हिम्मत से करे ये समझाए.
कल का भविष्य कमजोर कमजोर नहीं मजबूत हाथो में सौपने का फ़र्ज़ हर माँ बाप का है ..इसलिए उनको ही पहल करनी होगी अपने बच्चे में आत्मविश्वाश जगाने की और आत्मा हत्या जैसा रास्ता कायर अपनाते है ये सिखाने का काम भी माँ बाप ही अच्छी तरह कर सकते है. बच्चे का मानसिक तौर पर मजबूत बनाये न कि कमजोर मानसिकता का इंसान .इसके लिए बच्चे को हर परिस्थिति से निपटना सिखाना होगा ही,
तभी एक मजबूत कल कि परिकल्पना साकार हो सकेगी.
टाइम..१०.३० pm......२०/७/१०

36 comments:

manoj said...

सुसाइड /आत्महत्या ..

sakhi ji


aaj k es jiwan k maine bahut badal gae hai mujhe y dekh ker bahut accha lgta hai ki apne un sab k dukh ko mahsus kiya warna kone hai jo kisi k dukh m samil hota hai

Udan Tashtari said...

निश्चित ही एक सुरक्षा, मनोबल और प्रेम की भावना देना होगी ...नितांत एकाकी और असुरक्षा की भावना ही आत्म हत्या को प्रेरित करती है.

Dr.Priya said...

सखी,
तुम्हारे विचार जान कर अच्छ लगा...सच कहा तुम ने आज लोगो ने आत्महत्या को मजाक बना दिया है... जीवन इतना सस्ता पहले तो नही था...पर इस में गलती हमारे समाज की ही है... हम अपने घर परिवार को अपने पांव की बेडी समझते है ! संयुक्त परिवार छोड कर एकल हो जाना चाहते है...हमारे बच्चे घर और मां-बाप के साये की बजाय अकेले जीवन को आजादी और तरक्की मानने लगे है ! तो तुम ही कहो...अकेलापन इन्सान को कहीं न कहीं तो तोडेगा... अपनो के साये के बिना... उनके भावनात्मक संबल के बिना कोई कितनी दूर तक चल सकेगा...!?! हमे ये समझना ही होगा कि हजार दोस्त हो तो भी रोने के लिये मां की गोद और पिता के कंधे से बढ कर कोई सुरक्षित स्थान नही है.... सोच कर देखो....!!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सार्थक लेख....आज शायद बच्चे अपने आप को बहुत असुरक्षित समझते हैं ....ज़रूरी है माँ और पिता की भागीदारी बच्चों के साथ....

Sharma ,Amit said...

सखी जी, पहले तो लेख के बारे में ... अच्छा लिखा है और सवाल भी वाजिब है ...
अब सवाल का जबाब ... यह ऐसा सवाल है जिसका जबाब सबको पता है मगर स्वीकार कोई नहीं करना चाहता.. या फिर उस से मुह फेर लेता है ... इन सब के लिए सिर्फ और सिर्फ हम लोग जिम्मेदार है ...
हम लोग आज कहीं भागे जा रहे है .. सब को कुछ बनना है , सब को नाम , पैसा , सोहरत , सब कुछ चाहिए .. कुछ भी कर के ... इस अंधी दौड़ में हम सब इतने आगे जा चुके है की हम को पीछे क्या छुटा पता ही नहीं ...माँ बाप को यह नहीं पता की उनका बच्चा पीछे छुट गया या उनसे कहीं आगे निकल गया ??? दूरियाँ इतनी बढ गईं है की पीछे या आगे दिखने पर कुछ दिखाई नहीं देता ...और इस सब पर लालच और इर्षा का मोटा चश्मा... कुछ दिखे तो भला कैसे,,,
हालत इतने खराब है की सोच -विचार से तो कम से कम कुछ होगा नहीं ...और जिस से होगा ,वो काम कोई करेगा नहीं ... तो उपाय यह है जो चल रहा चलने दीजिये ... बुरा लगे या भला , मस्त रहिये ...

डा.सुभाष राय said...

जीवन इतना सुन्दर है. अगर जीवन के अलावा कुछ भी नहीं है तो भी आदमी सब कुछ जुटा सकता है. फिर अपने को मारना कैसा? आत्महत्या शब्द मुझे ठीक नहीं लगता है क्योंकि आत्म को मारना तो सम्भव ही नहीं है. हां अपने शरीर को कोई चाहे तो मार सकता है पर यह असंगत है, नासमझी है. जो यह नहीं समझते कि शरीर है तो सारे साधन जुट जायेंगे, वही कदाचित ऐसे फैसले करता है.

डा.सुभाष राय said...

जीवन इतना सुन्दर है. अगर जीवन के अलावा कुछ भी नहीं है तो भी आदमी सब कुछ जुटा सकता है. फिर अपने को मारना कैसा? आत्महत्या शब्द मुझे ठीक नहीं लगता है क्योंकि आत्म को मारना तो सम्भव ही नहीं है. हां अपने शरीर को कोई चाहे तो मार सकता है पर यह असंगत है, नासमझी है. जो यह नहीं समझते कि शरीर है तो सारे साधन जुट जायेंगे, वही कदाचित ऐसे फैसले करता है.

दीपक 'मशाल' said...

जीवन में बहुत सारे हालात ऐसे आते हैं जिनमें व्यक्ति घोर निराशा से घिर ऐसे कदम उठा लेता है.. इस सबके पीछे इज्ज़त और बेईज्ज़ती के तमगे बांटने वाले हम-आप और ये समाज सबसे ज्यादा उत्तरदायी है.. जिसदिन व्यक्ति इन छद्म अपमान-सम्मानों से ऊपर उठ कर जीना सीख लेगा.. कोई खुदकुशी भी नहीं करेगा..

Alam Khursheed said...

अस्ल में आज के जीवन में हमारी आकांक्षाएं इतनी ज़ियादा बढ़ गई हैं कि हम उन को लेकर बहुत ज़ियादा संवेदनशील हो गए हैं.क्या उचित है क्या अनुचित इस की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता. बस हम किसी तरह वह सब कुछ हासिल कर लेना चाहते हैं जो हमें अच्छा लगता है चाहे हम उसके लायक हों या न हो.
चाहतों की यह अंधी दौड़ ही ने हमें इस खतरनाक मोड़ पर पहुंचा दिया है. हम सब को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा.
सखी! आप ने बड़ी ख़ूबसूरती से कविताई अंदाज़ में अपनी बातें रखी हैं और सोचने पर मजबूर किया है. आप की संवेदनशीलता को मेरा सलाम!

संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...

Jo maiN kahna chahta tha Deepak Mashaal ne kah diya hai...

हरकीरत ' हीर' said...

आत्महत्या की मुख वजह डिप्रेशन होता है ....कोई जानकर नहीं करता आत्महत्या .....मानसिक तनाव जिसने झेलें हों वो इस बात को अच्छी तरह समझ सकता है ......!!

किसी डा की भी सलाह लें .....!!

रश्मि प्रभा... said...

इस प्रश्न का उत्तर हमारे ही पास है, खुद से परिवर्तन, खुद को समझाना, खुद को भी सामने रखना ज़रूरी है , ......

अनिल कान्त : said...

आत्महत्या के लिये निश्चित तौर पर मानसिक तनाव की चरम सीमा होती होगी ....ऐसे में माता पिता को चाहिए कि अपने बच्चे का पालन-पोषण अच्छे से करें उसे इस लायक बनाएं कि वह आने वाली जिंदगी में होने वाली परेशनियों से घबराये ना...जब इंसान समाज के तराजू की कसौटी की परवाह किये बिना जीना सीख जायेगा ...तो निश्चित तौर पर ऐसी घटनाएं बहुत कम होंगी

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

aapki mail padhne ke baad ek baar to m ain dar gaya tha kyuki aapne likha tha, haazir hoon main....aatmhatyaa", i was like shocked for a moment...I am honored to be your reader...

OK, for me suicide is a deed of no use...sheer cowardness....no one shud commit it....

प्रदीप कांत said...

आत्मह्त्या याने मानसिक तनाव का चरम। समस्या का हल इतना आसान नहीं है। वे कारण जिनके कारण ये चरम आ पहुँचचता है, पहले से ही खत्म करने आवश्यक हैं। पर तथाकथित टीन एज (जो पढ लिख कर विकसित और समझदार होने की उम्र है) का आकर्षण ही यदि आत्मह्त्या करने को मजबूर कर रहा है तो और ज्यादा विचारणीय स्थिति बन जाती है। यानि प्रेम और मात्र आकर्षण में कोई फर्क ही नहीं। फिर तो हम भी सही तरीके से बच्चों का संस्कार देने में असमर्थ हैं।

Jolly Uncle said...

You have really touched a very nice topic....It is the need of the hour. I am trying to reduce stress, tension and depression from our society thru my Jokes and motivational articles. I am doing this job for the last 10 yrs. The main reason of sucide I have observed is that there is no balance and patience in new generation.
Congrats for writing a wonderful subject. - Jolly Uncle - www.jollyuncle.blogspot.com

girish pankaj said...

आत्महत्या हताशा से उपजी ऐसी दारुण स्थिति होती है, जिसे न चाहते हुए भी लोग कर बैठते है. मै आत्महत्या के विरुद्ध हूँ. बहुत से लोग है. फिर भी आत्महत्याएं होती है. आत्महत्या करने वाले लोग कायर नहीं होते. दरअसल हालात ही ऐसे हो गए है. कि सही आदमी के सामने मर जाना ही एक रास्ता नज़र आता है. जीएगा तो घुट-घुट कर मरेगा. निर्लज्ज व्यवस्था ऐसी है,कि जीते-जी आपकी सुनेगी नहीं, मरने के बाद श्रद्धांजलि देने पहुंच जायेगी. अभी मेरी लेखनी पर नाक -भौ सिकोड़ेगी. तरह-र्तारह से प्रताड़ित करेगी, मगर मै आत्महत्या कर लूं, तो मुझे महाकवि बता कर मेरे नाम से कोई पुरस्कार भी शुरू कर सकती है. यह वक्त भले लोगों के जीवित रहने का नहीं है. मरना ही सबसे सही रास्ता लगाने लगता है. मैं भी कई बार सोचता हूँ, कि जीना बेकार है. मगर अपने ही शेरो का सहारा लेकर जिंदा हूँ. पता नहीं कब तक, मगर अभी तो हूँ मैंने लिखा है-
आसमान से टूटा इक तारा नहीं हूँ मै
जब तलक जिंदा हूँ, हारा नहीं हूँ मैं.
एक और शेर है, जिसके सहारे जिंदा हूँ,
आकी शुभकामनाएँ साथ है,
क्या हुआ गर कुछ बलाएँ साथ हैं
हारने का अर्थ यह भी जानिये
जीत कि संभावनाएं साथ है.
इस अँधेरे को फतह कर लेंगे हम
रोशनी की कुछ कथाये साथ है.
इसलिए मुझे लगता है, अंतिम दौर तक कोशिश करना चाहिये. हताशा से उबरा भी जा सकता है. दिल को समझाया जा सकता है, कि ''जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा''. बहुत अच्छी पोस्ट, इसने कुछ सोचने पर मज़बूर कर दिया. कभी विस्तार से लिखूंगा, इस विषय पर...

शरद कोकास said...

अगर आप अपने आप को जन्म नहीं दे सकते तो आप को अपने आप को मारने का क्या हक़ है ।

शरद कोकास said...

लेकिन इसका अर्थ यह भी नही कि जो आपको जनम दे सकता है उसे आपको मारने का हक़ है ।

निर्झर'नीर said...

यक़ीनन सार्थक प्रभावी और चिंतनीय लेख ..आपका प्रयास सराहनीय और चिंतन वाजिब है
कहीं ना कहीं हम सब ज़िम्मेदार है ..खासकर हर माँ ...बाप

तिलक राज कपूर said...

आत्‍महत्‍या (स्‍वेच्‍छा मृत्‍यू नहीं) निराशा की परणिति होती है इसपर तो शायद ही दो मत हों। मूल प्रश्‍न है कि निराशा होती क्‍यों है। इसकी व्‍याख्‍या में यूँ तो सैकड़ों लेख लिखे जा सकते हैं लेकिन यह तय है कि अधिकॉंशत: निराशा का कारण बाह्य होता है जिसपर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता और हम चाहते हैं कि सब कुछ वैसा ही हो जैसा हम चाहते हैं। यह तो एक अजीब सी स्थिति हुई न कि हम नियंत्रण से बाहर की स्थितियों पर नियंत्रण चाहते हैं और जो नियंत्रण में है उसपर ध्‍यान नहीं देते।
उदाहरण के लिये एक बच्‍चे को लें जो इसलिये आत्‍महत्‍या कर लेता है कि उससे कम पढ़ने वाले बच्‍चे के नंबर अधिक आ गये- जो हुआ उसके कई कारण हो सकते हैं- लेकिन आत्‍महत्‍या करने के बजाय उस बच्‍चे के पास विकल्‍प खुला होता है कि वह जो हुआ उसके कारणों में से ऐसे ऐसे कारणों को तलाशे जो उसके नियंत्रण में हैं और उन कारणों के निवारण पर केन्द्रित हो।

नीरज गोस्वामी said...

दरअसल अब हम में सहनशीलता का अभाव हो गया है इसलिए छोटी छोटी बातों पर हम हार मान लेते हैं अपने दिल को दुखी कर लेते हैं और अवसाद में आत्महत्या कर लेते हैं...आज के दौर में पहले जैसी बेफिक्री, आत्मीयता और दोस्ती का अभाव भी इसके मूल कारणों में से एक है...

नीरज

Parul said...

sakhi..bahut hi gambhir vishay ko sanjidgi se likha hai..keep it up!

वन्दना said...

फ़र्ज़ तो माँ बाप का ही बनता है मगर ये संस्कार बचपन से ही सिखाये जाते हैं मगर आज कल बच्चों को गलती करने पर टोका नही जाता बल्कि हंसा जाता है खुश हुआ जाता है तो ऐसे मे बच्चे पर क्या असर होगा……………यही कि गलत करने को वो ज़िन्दगी मे कभी गलत समझेगा ही नही उसकी निगाह मे गलत काम भी सही हो जायेगा फिर यदि बाद मे वो ऐसा कदम उठाता है तो इसमे उसका क्या दोष? ये दोष आज की परवरिश का है और जब तक ये सब नही समझेंगे इसी प्रकार हादसे होते रहेंगे।

वाणी गीत said...

वंदना जी से सहमत ...!

जेन्नी शबनम said...

सखी जी,
आपने सामयिक विषय पर लिखा है, जो बहुत बड़ी समस्या है| रोष होना और उत्तेजना में ख़ुद को ख़त्म कर लेना निःसंदेह गलत है, पर दोषी कौन, ये चिंतन का विषय है| बदलते परिवेश के अलावा कहीं न कहीं दोषी तो हम माता पिता भी हैं| अक्सर मैंने देखा है कि जब छोटे बच्चे को चोट लग जाती या फिर गिर पड़ता और रोने लगता है तो हम ज़मीन को या फिर जिससे चोट लग जाती है उसे झूठ का मारते हैं और बच्चे को ये कहते कि जिसने तुमको चोट पहुँचाया देखो उसे हमने मारा है अब चुप हो जाओ| छोटी उम्र में तो बच्चा चोट से रोता रहता है लेकिन जब थोड़ा बड़ा होता तो ये समझ जाता कि जिसने चोट पहुँचाया उससे बदला लिया जाता है| और आश्चर्य कि थोड़ी बड़ी उम्र का बच्चा ऐसे मारने से चुप भी हो जाता है, भले हीं वो ज़मीन हो या फिर बड़ा या छोटा भाई बहन| बच्चों में असहनशीलता और बदले की भावना की नींव तो वहीं से पड़ जाती है| अगर बच्चे को चोट लगी है तो रो ले, इसमें क्या हर्ज़ है| अपने बच्चों का रोना हम नहीं सह सकते भले दूसरे का सह लें, ये बात बच्चे समझने लगते हैं और आगे चलकर यही सब स्थिति| शिक्षा पद्धति हो या फिर समाज का ढांचा, ये सब भी जिम्मेवार है इसके लिए|
अच्छा विषय और सार्थक लेख, बधाई स्वीकारें | शुभकामनाएं|

जेन्नी शबनम said...
This comment has been removed by the author.
जेन्नी शबनम said...
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Arvind Mishra said...

बहुत अच्छा लिखा है !

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

आजकल लोग कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गए हैं ...
बढ़िया पोस्ट !

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

आलेख और टिप्‍पणियों से विमर्श प्रस्‍तुत करने के लिए धन्‍यवाद.

रचना दीक्षित said...

आत्महत्या के लिये निश्चित तौर पर मानसिक तनाव की चरम सीमा होती है आजकल लोग कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गए हैं

एक अच्छा मुद्दा उठाया है

प्रमोद ताम्बट said...

माँ-बापों के हज़ार प्रयास भी इस प्रवृत्ति को रोक नहीं सकते क्यों कि यह सब कुछ सामाजिक परिस्थितियों की उपज है। जब तक हम मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों को बदलने की लड़ाई में सचेत रूप से अपनी भूमिका नहीं निभाते परिस्थितियों में कोई परिवर्तन आना संभव नहीं लगता।

प्रमोद ताम्बट
भोपाल
www.vyangya.blog.co.in
http://vyangyalok.blogspot.com

सुरेश यादव said...

सखी जी ने महत्वपूर्ण सवाल उठाया और इस बहाने अच्छी चर्चा हो गई.बधाई.

VIJAY TIWARI 'KISLAY' said...

आत्महत्या पर लिखा सखी जी का आलेख प्रेरणास्पद तथ्य को इंगित करता है.
निश्चित रूप से दुनिया के हर माँ- बाप और शिक्षकों का दायित्व है कि वे बच्चों को
मानसिक तौर पर मजबूत बनाएँ न कि कमजोर मानसिकता के इंसान.
सखी जी का आभार , इतने सहज ढंग की प्रस्तुति के लिए.
- विजय तिवारी ' किसलय '

श्याम सखा 'श्याम' said...

आत्महत्या,खुदकुशी
परिवार के विघटन के मुख्य कारण
- पहले बच्चे छुट्टियों में-मामा नाना ,बुआ,दादी के पास जाते थे, या इन लोगो के घर आने पर उनसे बतियाते थे-अब जैसे ही बच्चे नमस्कार,चरण स्पर्श आदि के तुरन्त मां या पिता कहते हैं जाओ पढ़ लो वक्त खराब मत करो- यानि बच्चे को अप्नो से टूटना सिखा दिया-आगे नौकरी लगते ही वे पहले मां बाप से फ़िर खुद से टूट जाते हैं यह आत्म हत्या का कारण बनता है
-हमारे जमाने में सु्विधायें कम थी मिलती भी तो कई बार मांगने पर मिलती थी अब बिन मांगे ही बच्चों को मिल जाती है वे इस बात के आदि हो जाते हैं फ़िर नौकरी या शिक्षा में जब उनकी मनचाही नहीं होती तो वे सहन नहीं कर पाते -- खुदकुशी
-पहले परिवार में पिता का अनुशासन होता था- मां अक्सर बच्चों को यह कह्कर अनुशासित करती थी कि आने दो तुम्हारे पिता को-अब मां ही पिता को कुछ नहीं समझती सो बच्चे अनुशासन सीखते ही नहीं
---- माता पिता की महत्वकांक्षाएं ,बच्चे योग्य हो न हो डोनेशन से डाक्टर- इन्जिनियर बनाते हैं जो मां बाप डोनेशन देने को नहीं है उनके बच्चे मायूस हो जाते हैं - माता पिता से विमुख हो जाते है व फ़्रस्ट्रेट हो जाते हैं= श्याम